एक भ्रमर की यात्रा
: चतुरानन झा 'मनोज'

श्रावण का महीना चल रहा था
पर,
पेड़ ठूंठ से खड़े थे
कुछ नव किसलय जो
उगे थे चंद पेड़ों पर
शुककीट उन किसलयों को
चट करने में रत थे
उदित हुआ था सूर्य अभी-अभी।
एक भ्रमर जगा नींद से
काला...
कोयले से भी ज्यादा
उड़ा, पहुँचा एक बगीचे में
तितलियों औ' मधुमक्खियों ने
पहले ही से
डाल रखा था डेरा उस बगीचे में
पर...
यह क्या ????
हर पौधा तो हरा- भरा था
किंतु मधुविहीन हो चले थे पुष्प।
न मिल पा रहा था
एक भी सुमन
कि वे अपनी तृषा मिटा सकें।
 
प्रतिद्वंद्विता मची थी फ़िर भी
तितलियों औ' मधुमक्खियों में
लेह रहे थे ओस.......
देखकर मन क्षुब्ध हो गया भ्रमर का
उड़ चला वह
इस बाग़ से उस बाग़
हर बाग़ की थी यही कहानी
न था कहीं मधु उच्छवसित।
थक गया वह उड़ते उड़ते
पर रुका नहीं वह
रुकता तो शायद मर जाता
अपना ही भूख चबाकर खाता।
सोचा, मिलता चलूँ कमलिनी से
वह तो ज़रूर बाँटेगी उसका दुःख।
गया कमलिनी के पास
पर...
कमलिनी ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
उसने देखा
शतदलों में उसकी कोई और ही
पनाह पा रहा था
उन दलपुंजों के बीच स्थित
अंडकोष पर अपना मधु लुटा रहा था।