तुम न आये
: अरुणा सिंह

लौट कर आयी नहीं
उन क़दमों की आहटें

सीडियां बुझी बैठी रहीं
तरस गयीं घर की दीवारें

दिन के कंधे झुक गए
सूरज भी थक के सो गया

सुनसान गली बाहें फैलाये
रात की काली चादर ओड़

हर आहट पर आहत होती रही
पर तुम न आये !

आया तो आया
बस यादों का एक पुलिंदा
सुखी पत्ते की तरह

न जाने कहाँ से उड़ के आया
घर के दरवाजे पर सुबह पड़ा पाया !